पोती जन्मीं तो जो दादी हो गई थी सुन्न, वो ही अब डीजे पर सारी रात नाची

आज से दो दशक पहले बेटी के जन्म पर परिवार के लोग ज्यादा खुश नहीं होते थे। यही दंश झेल चुकी है इस बार यूपीएससी एग्जाम में 117वीं रैंक हासिल करने वाली चारावास
 
The grandmother who had become numb when the granddaughter was born she now danced all night on the DJ
आज से दो दशक पहले बेटी के जन्म पर परिवार के लोग ज्यादा खुश नहीं होते थे। यही दंश झेल चुकी है इस बार यूपीएससी एग्जाम में 117वीं रैंक हासिल करने वाली चारावास की निशा चाहर।

निशा चाहर की दादी नानचीदेवी ने बताया कि उसके बेटे राजेंद्र की पत्नी चंद्रकला ने पहली संतान के रूप में बेटी को जन्म दिया। लेकिन यह बेटी प्री मेच्योर थी और स्वास्थ्य कारणों के कारण यह बेटी जन्म के दो-तीन घंटे बाद इस दुनिया से रूखस्त हो गई थी। इसके करीब डेढ साल बाद चंद्रकला ने फिर से एक बेटी को जन्म दिया तो पूरे घर में सन्नाटा पसर गया था। नानचीदेवी ने तो यहां तक कह दिया कि उसके छोटे से बेटे के दूसरी बेटी हो गई। लेकिन बेटे राजेंद्र ने नानचीदेवी को ही इस दूसरी बेटी का ख्याल रखने की जिम्मेदारी दे दी।

The grandmother who had become numb when the granddaughter was born she now danced all night on the DJ


यह बेटी कोई और नहीं बल्कि आज की आईएएस निशा चाहर थी। जिसकी दादी को शायद उस वक्त निशा के जन्म पर खुशी ना हुई हो। लेकिन वही दादी आज निशा की उपलब्धि पर इतनी बावरी हो गई कि जिस दिन यूपीएससी का परिणाम आया। तो वो ना केवल पूरी रात लोगों को मिठाई बांटती फिरी। बल्कि डीजे पर ठुमके लगाने में पीछे नहीं हटी। यही नहीं वह रात भी खुशी के मारे सोई भी नही। नानचीदेवी ने बताया कि यह सच है कि जिस दिन निशा का जन्म हुआ। वह भी जरा सी भी खुश नहीं थी और उसे यही लग रहा था कि आखिर ये दूसरी बार बेटी ही क्यों हुई। बेटा क्यों नहीं। दादी नानचीदेवी ने बताया कि उन्हें पहली बार ऐसा तब महसूस हुआ कि बेटी भी बेटे से कहीं कम नहीं है। जब निशा छह साल की थी और गांव में एक आईएएस की चर्चा हो रही थी। जब निशा ने दादी को कह दिया था कि क्या कलेक्टर-कलेक्टर लगा रखी है। मैं बनकर दिखाउंगी कलेक्टर। हालांकि तब निशा को पता भी नहीं था कि कलेक्टर क्या होता है। कैसे बनते हैं।

हालांकि निशा आईएएस पहले ही प्रयास में क्लियर कर लेगी। इसका अंदाजा तो उसके शिक्षक पिता राजेंद्र चाहर को भी नहीं था। यूपीएससी परीक्षा को लेकर निशा चाहर से ज्यादा तनाव उनके घरवालों पर था। पोती निशा की सफलता पर खुशी से लबरेज दादी नानचीदेवी ने बताया कि वह अक्सर पूजा करते वक्त एक टाइम ही दीपक किया करती है। लेकिन बेटी की सफलता के लिए उसने ना केवल दो-दो बार दीपक जलाए, बल्कि दियों का घी कभी खत्म नहीं होने दिया और बालाजी से यही प्रार्थना की कि पोती सफल हो जाए।

पिता राजेंद्र ने बताया कि वे कभी नहीं चाहते थे कि निशा आईएएस की पढाई करें। क्योंकि जब 11वीं में विषय चुनने की बारी आई तो उन्होंने निशा को बायलॉजी के लिए कहा। लेकिन निशा ने मैथ्स ली। निशा ने अपना बचपन याद करते हुए बताया कि उसे याद है कि पहली बार वह स्कूल गई तो उसे कोई लेकर नहीं गया था। वह खुद ही चली गई थी।

निशा ने बताया कि वह बचपन से ही कलेक्टर बनना चाहती थी। लेकिन उसे यह नहीं पता था कि कौन बनता है, कैसे बनता है। लेकिन कभी कभार झुंझुनू जाना होता तो झुंझुनू में कलेक्टर के बंगले के सामने से गुजरती तो सोचती कि मैं भी बड़ी होकर कलेक्टर बनूंगी तो ऐसे बंगले में रहूंगी। गाड़ी होगी और काफी सुख-सुविधा होगी।

निशा चाहर ने बताया उसे हर बार रिजल्ट से पहले ऐसी घबराहट हुई कि उसे परिवार के लोगों ने सांत्वना देकर चुप कराया और फिर रिजल्ट देखा तो खुशी हुई। लेकिन वह परीक्षा से पहले और परीक्षा के दौरान कभी नहीं घबराई। उसका मानना है कि परीक्षा में मिलने वाले तीन घंटे हमारे है। उस वक्त हमारे से बेस्ट कोई नहीं। जो आ रहा है उसे बेस्ट करो। घबराहट हो रही है तो परीक्षा के बाद बाहर आकर रोवो, गुस्सा करो, कुछ भी करो। लेकिन परीक्षा हॉल में केवल और केवल जो आ रहा है। उसे बेस्ट करो।

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