मुस्लिम पति के पत्नी को तलाक देने के विशेष अधिकार को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

दिल्ली हाई कोर्ट ने मुस्लिम पतियों द्वारा अपनी पत्नी को किसी भी समय कोई कारण बताए बगैर तलाक देने के विशेष अधिकार को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस विपिन सांघी की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा है कि संसद पहले ही इस पर कानून बना चुकी है।

 
HC dismisses plea Talaq ul Sunnat 

नई दिल्ली, 27 सितम्बर। दिल्ली हाई कोर्ट ने मुस्लिम पतियों द्वारा अपनी पत्नी को किसी भी समय कोई कारण बताए बगैर तलाक देने के विशेष अधिकार को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस विपिन सांघी की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा है कि संसद पहले ही इस पर कानून बना चुकी है।

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की याचिका आधारहीन है। संसद ने इस मसले पर हस्तक्षेप किया है और मुस्लिम वुमन (प्रोटेक्शन ऑफ राईट्स ऑन मैरिज) एक्ट को लागू कर दिया है। इस कानून की धारा-3 के मुताबिक अगर कोई मुस्लिम पति अपनी पत्नी पर तलाक बोलकर या लिखकर या इलेक्ट्रॉनिक रूप में या किसी अन्य तरीके से तलाक की घोषणा करता है तो वह गैरकानूनी होगा।

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याचिका 28 साल की एक मुस्लिम महिला ने दायर की थी। याचिकाकर्ता की ओर से वकील बजरंग वत्स ने कहा था कि मुस्लिम समुदाय में किसी भी समय बिना कारण बताए और पहले से बिना नोटिस दिए तलाक (तलाख-उल-सुन्नत) देने के पति के एकतरफा अधिकार गैरकानूनी है। याचिका में मुस्लिम पति के इस अधिकार को मनमाना, असंवैधानिक और बर्बर बताया गया था। याचिकाकर्ता के पति ने आठ अगस्त को तीन तलाक देकर उसे छोड़ दिया। महिला के मुताबिक उसका पति दूसरी शादी करने की योजना बना रहा है। उसके बाद महिला ने पति के एकतरफा अधिकार को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

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