होलिका दहन पर इस विधि से करें पूजन,लौटेगी खुशियाँ , होगा फल

शास्त्रों के अनुसार होली के एक दिन पहले होलिका दहन होती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन के बाद अगली सुबह को गुलाल और रंगों से लोग सराबोर होने लगते है। लोग मस्ती में फागुआ और गीत गाते हैं। इस बार फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा
 
होलिका दहन पर इस विधि से करें पूजन,लौटेगी खुशियाँ , होगा फल

शास्त्रों के अनुसार होली के एक दिन पहले होलिका दहन होती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन के बाद अगली सुबह को गुलाल और रंगों से लोग सराबोर होने लगते है। लोग मस्ती में फागुआ और गीत गाते हैं। इस  बार फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा की तिथि 9 मार्च को होलिका दहन होगा।

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शास्त्रों के अनुसार  दहन का रिवाज कई साल से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है। जिसके अनुसार होली के एक महीन पहले माघ पूर्णिमा वाले दिन गुलर के पेड़ की टहनी को मोहल्ले के चौराहे के बीच में लगा दिया जाता है। इसके बाद फाल्गुन पूर्णिमा पर लोग मिलकर लकड़ियां एकत्र कर होलिका दहन करते है।

होलिका दहन पर इस विधि से करें पूजन,लौटेगी खुशियाँ , होगा फल

शास्त्रों के अनुसार दहन करने से पहले विधिवत पूजा की जाती है और दहन की शुभ मुहूर्त देखा जाता है फिर होलिका को अग्नि दी जाती है। होली की पूजा के लिए रोली, कच्चा सूत, चावल, पुष्प, साबुत हल्दी, बतासे, श्रीफल और बुल्ले फूल माला, चावल गुड़ और नई पकी फसल के पौधों की बालियां रखें। और एक थाली में समस्त पूजन सामग्री रख ले। शास्त्रों के अनुसार दहन के शुभ मुहूर्त के समय मालाएं होलिका को अर्पित की जाती है। इसके बाद तीन या सात बार होलिका का परिक्रमा करना चाहिए। अंत में लोटे में भरा जल रही होली का पर चढ़ा दें।

शास्त्रों के अनुसार दहन पूर्णिमा तिथि में प्रदोष काल के दौरान करना चाहिए लेकिन ध्यान रखें कि जब भद्राकाल चल रहा हो तो इस दौरान  दहन नहीं करना चाहिए। भद्राकाल के समय दहन अशुभ माना जाता है ।

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